भाई-भतीजावाद वाली राजनीति का विश्लेषण – लोकतंत्र है या राजतंत्र

विगत वर्षों में हमने देखा है लोकतंत्र या चुनाव को भारत में एक पर्व की तरह मनाया जाता आ रहा है। पर क्या यह पर्व और ख़ुशी आज भी बरक़रार रहनी चाहिए या नहीं। 

प्राचीन काल के परंपरा को हम समयानुसार परिवर्तित करते हैं एक अच्छे वर्तमान व बेहतर भविष्य के लिए पर क्या ये हमे या आपको प्राप्त हो  रहा है यह विचारणीय है। चाचा विधायक हैं हमारे का चलन बढ़ रहा है । 

आज़ादी के बाद जातिवाद, परिवारवाद, सम्प्रदायवाद, तुष्टिवाद का विकास हुआ । राष्ट्रवाद, नैतिकतावाद, त्यागवाद का प्रशिक्षण तथा संस्कार न शिक्षा द्वारा दी गयी न समाज, न परिवार, न सरकार द्वारा जिसका भयावह परिणाम सामने है।अयोग्य, स्वार्थी, सिद्धांतहीन राजनेताओं का एक मात्र आधार जाति होने के चलते देश में मेधा, चरित्र, त्याग, सेवा का महत्व नगण्य हो गया है इसलिए  देशसेवा, कर्मठ, योग्य, त्यागी प्रतिनिधि पंचायत से लेकर केंद्र तक नहीं चुने जाते। अगर कुछ अपवाद हैं तो प्रभावी नहीं हैं फिर भी वे धन्यवाद् के पात्र है जो विपरीत वातावरण में अपने पूर्वजों की धरोहर ईमानदारी बचाकर रखें हैं। यदि जनता आलोचना छोड़कर ईमानदारी और समझदारी का प्रयोग कर चाहे तो किसी दल के वंशवादी परिवारवादी को हराकर दिशा, दशा बदलने का संदेश तो दे हीं सकती है ।

जातीयता तोड़ती है , संस्कृति जोड़ती है !

जातियता स्वार्थ जगाती है,  राष्ट्रीयता त्याग सिखाती है !!

प्राचीन समय में राजतंत्र की प्रणाली को इसलिए ही नकारा गया था क्यूंकि राजा के वंशज सक्षम हों या न हो उन्हें उस क्षेत्र का राजा घोषित कर दिया जाता था जो की प्रजा पर राज तो करते हीं थे साथ में अराजकता और शोषण को भी बढ़ावा देते थे । 

राजनैतिक तंत्र

राजनैतिक तंत्र एक दर्शन को प्रदर्शित करता था। वह शासन काल पूर्णता राजा को समझ और सोच पर निर्भर करता था।  राजा के वंशज को ईश्वर का प्रतिनिधि मान प्रजा पर शाशन करने के लिए छोड़ दिया जाता था।  सत्ता के साथ मनुष्य का संबंध बहुत पुराना है। समाज को संगठन चाहिए और संगठन को ऐक्यबद्ध रखने के लिए सत्ता। इसका लोभ उससे भी पुराना कहा जा सकता है।

ग्रन्थ, कहानियों और किताबों को माने तब उस काल खंड में भी भगवान, मानव , दानव सभी आदि काल से राज करने  के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार होते हैं।  

परन्तु फिर भी इस परंपरा के अनुसार राजा के कुछ गुण व योग्यता निर्धारित किये गए जिसके अनुसार राजा शासक ही नहीं पालक भी होता है जो की किसी व्यक्ति की अपेक्षा अपने माता पिता से होती है । राजा को शासन करना आना चाहिए और साथ हीं उसे जन कल्याणकारी भी होना चाहिए। 

पर ये सभी विचारधारा सिर्फ किताबों तक हीं सिमित रह गयी हैं।  आज लोकतंत्र के इस कालखंड में स्थिति और भी भयावह है।  राजनीती व पार्टियां भी अब पैतृक संपत्ति की तरह हो गयी है जो वंशज सक्षम न हो फिर भी उन्हें दे दी जा रही हैं और जो भी शीर्ष नेता उस पार्टी में रह रहे वो भी पुराने काल के अनुसार सिर्फ कुछ राजा के चाटुकार के दृश्य को वास्तविकता में प्रस्तुत कर रहे हैं । यदि कुछ लोग इस पर सवाल करें या दूसरे पथ पर अग्रसर हों तो वो सजा और उलाहना के भागीदार बन रहे।  

राजनीति सेवा है पेशा नहीं

आज के इस बदलते परिवेश में राजनीति और पार्टियों का पैतृक संपत्ति के तरह प्रयोग होना देशहित या राज्यहित में कभी भी नहीं हो सकता ।  कुछ स्वार्थी नेता समाज भंजक वंश के लिए तर्क देते हैं कि डॉक्टर, अधिकारी का बेटा, बेटी पिता का पेशा अपना सकता है तो राजनेता संतान राजनीति में उम्मीदवार क्यों नही बन सकता? ध्यान देने योग्य बात है की डॉक्टर, अधिकार बनने के लिए सन्तानें कठिन परिश्रम तथा परीक्षा की प्रक्रिया उत्तीर्ण होकर पातें हैं  जो राजनीति में नहीं हैं ।

यह बातें सिर्फ किसी व्यक्ति विशेष या पार्टी के लिए नहीं है  और साथ ही किसी भाई बेटे या भतीजे को राजनीति में जुड़ने की मनाही भी नहीं है।  पर जैसे की किसी भी पेशे में प्रारंभिक रेखा सबके लिए समान होता है और लोगो को पढाई शुरू से करनी होती है और फिर परीक्षा उत्तीर्ण होकर वो उस पहचान या पद को पाते हैं तो उसकी गरिमा या उपयोगिता पता होती है।  उसी प्रकार राजनीति में भी पहचान, पदभार और प्रतिष्ठा पैतृक संपत्ति की तरह आगे जुड़ना नहीं चाहिए बल्कि उन्हें भी कार्यकर्ता के रूप में जन सेवा कर वो पद और पार्टी में प्राथमिकता चयन प्रक्रिया द्वारा पाया जाना चाहिए जो की कोई आम कार्यकर्त्ता अपने कार्य के अनुसार कालांतर में पाता है। 

 राजनीति सेवा है पेशा नहीं … पार्टियां एवं  संस्था ऐसे लोगों का संगठन हैं जो समान सिद्धांतों का पालन करते हैं… न हीं किसी की संपत्ति …

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