पार्टी बदलते नेताओं का चारित्रिक एवं सैद्धांतिक विश्लेषण

अगर पार्टी ने अपना सिद्धांत बदला और आप अपनी जगह सही है तो आप वैसा कर सकते हैं । पर अगर किसी उम्मीदवार या कार्यकर्ता ने पार्टी और पार्टी  सिद्धांत वही है तो कहीं न कहीं ये संदेहास्पद है और स्वार्थ झलकता है।  क्योंकि जिस पार्टी या उसके सिद्धांतों का विरोध कर विपक्ष पार्टी का कार्यकर्ता पक्ष में आ जाता है वह स्वार्थ  हीं निहित है या और क्या हो सकता है यह विचारणीय है।

पार्टी सिद्धांतों पर बनती है और जो लोग पार्टी से जुड़ते हैं वो उस सिद्धांत के समर्थक होते हैं न कि किसी व्यक्ति विशेष या क्षेत्र के ! यदि कुछ लोग इस पर सवाल करें या दूसरे पथ पर अग्रसर हों तो वो सजा और उलाहना के भागीदार बन रहे हैं।  

कोई भी व्यक्ति किसी संघ, समुदाय, संस्था या पार्टी से जुड़ा होता है मतलब वो उसके विचारों और सिद्धांतों का समर्थन करता है या उसकी अगुआई करता है। पर आज के राजनीतिक दौर में पार्टी, सिद्धांत, लक्ष्य ये सब सिर्फ शब्द मात्र से दिखते  हैं।  कोई भी व्यक्ति आज इस पार्टी से उम्मीदवार है कल दूसरी और परसो तीसरी। इसमें उस व्यक्ति की सोच, चरित्र, सिद्धांत किसी तरीके की जानकारी साफ़ सुथरी नहीं है।  

इस पर सम्भवत: उसके छवि या सोच पर प्रश्न उठता है।  जो राजा किसी समुदाय का हो, क्षेत्र का हो, राज्य का या राष्ट्र का – जिसकी सोच धूमिल है, सिद्धांत निश्चित नहीं हैं, वो लोगों का भला कैसे करेगा?  

एक निश्चित उद्देश्य और सिद्धांतों का समर्थन  करने वाले लोगो का समूह ही सामूहिक रूप से एक संस्था, पार्टी या संघ  का प्रारूप तैयार करते हैं। उन सिद्धांतों और उदेश्यों को मानने वाले ही उस संघ, उस पार्टी या उस संस्था से  जुड़ते हैं।  

पार्टी कोई भी उम्मीदवार क्यों बदलता है, उसके संभवत: तीन कारण हो सकते हैं- 

  1. व्यक्ति विशेष गलत विचारधारा का समर्थन करते थे जिसका एहसास उन्हें अब हुआ
  2. या फिर संघ की विचारधारा में ही बदलाव आ गया जिसका समर्थन अब नहीं कर सकते 
  3. अपितु खुद का ज्ञान चक्षु खुल गया और व्यक्तिगत विचार में बदलाव के कारण 

इन तीनों कारणों में किसी पार्टी या व्यक्ति का चरित्र चित्रण किया जा सकता है 

  1. व्यक्ति विशेष गलत विचारधारा का समर्थन करते थे जिसका एहसास उन्हें अब हुआ
    आज के दौर में ऐसा होना  सही नहीं दिखता, जबकि नेता व पार्टी कार्यकर्ता अवसरवादी  हो गए हैं।  उन्हें सिद्धांत , लक्ष्य , उद्देश्य से कोई लेना देना  नहीं बल्कि व्यक्तिगत लाभ जहाँ दिखा वहां के हो लिए।  यही बात पार्टी द्वारा उसमें जोड़े जाने वाले कार्यकर्ताओं  के लिए है जो की पार्टी के लाभ के लिए  उद्देश्य से समझौता कर भी किसी को भी उम्मीदवार बनाने को तैयार है। 
  2. संघ की विचारधारा में ही बदलाव आ गया जिसका समर्थन अब नहीं कर सकते
    अगर संघ के विचारधारा में बदलाव आ गया तो उसके सारे समर्थक जो कभी उसका प्रचार प्रसार करते थे।  उन सब को उस संस्था, पार्टी का साथ छोड़ देना चाहिए। वैसे संवैधानिक नियम के अनुसार भी अगर लोगों की निश्चित संख्या किसी पार्टी का साथ छोड़ती है तो वह स्वीकार्य है और समझ भी आता है ।
  3. खुद का ज्ञान चक्षु खुल गया और व्यक्तिगत विचार में बदलाव के कारण
    ये स्वार्थ साधने का साधन है।  जो अपने निर्णय या चुने रास्तों पर नहीं चल पाया।  उसके समर्थक बन कर आप अंधे रास्ते पर चलने का ही चुनाव करते हैं।  

इन सब में इनका दोष तो है हीं पर हम आप भी जिम्मेदार हैं।  हमने ही अपने जाति रिश्तेदार समुदाय को प्राथमिकता दी भले ही व्यक्ति की कोई योग्यता हो या कुछ भी उद्देश्य हो। उस उम्मीदवार ने अपने स्वार्थ हित में सारी बातों पर ध्यान दिया और हमने हर उस बात को नजर अंदाज किया जो हमारे हित में हो सकता है। इसलिए इन पर विचार करने की आवश्यकता है।  आप किसी पार्टी व्यक्ति का समर्थन करें उसमें परहेज़ नहीं पर आप क्यों कर रहे , उससे आपको, आपके परिजनों, आपके आस पास के लोगों को  क्या लाभ मिल रहा। आपकी सोच दूरगामी होनी चाहिए आप अपने परिजनों अपने बच्चों या बढ़ो को किस वातावरण में रखना चाहते हैं या उनको कैसा वातावरण मिलेगा , उनका भविष्य कैसा होगा आपके द्वारा चुने क्षेत्र के राजा या  नेता पर निर्भर करता है । 

इसलिए किसी पार्टी, नेता, उम्मीदवार के समर्थन के पहले उन पर विचार जरूर करें की आप अपना नेता कैसा चाहते हैं और जिस विचारधारा और सिद्धांत का समर्थन आप कर रहे हैं क्या वास्तव में उसका अंतिम परिणाम या निष्कर्ष वही है जिसका आप समर्थन या प्रसार कर रहे हैं ।  

अपना नेता कैसा चुनें उसके बारे में यहाँ पढ़ें यहाँ क्लिक करें 

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